अयोध्याकाण्ड · सर्ग 50
गंगा किनारे एक मित्र
गुह तीन थके यात्रियों का स्वागत करते हैं—देखभाल को प्रदर्शन बनाए बिना।
नदी किनारे समाचार
गुह को समाचार मिला कि राम, सीता और लक्ष्मण वन-जीवन के वस्त्र पहने गंगा की ओर आए हैं। गुह औपचारिक निमंत्रण की प्रतीक्षा नहीं करते। उन्होंने यात्रियों की जरूरत की वस्तुएँ जुटाईं और मिलने चले गए।
उन्होंने राम का स्वागत दरबार की दूरी से नहीं, मित्र की गर्मजोशी से किया। भोजन, जल, विश्राम की जगह और घोड़ों की देखभाल तैयार थी। उस स्वागत ने दिन भर यात्रा किए शरीरों की थकान देखी।
सुनने वाली देखभाल
राम ने स्नेह स्वीकार किया, पर वनवास के व्रत के अनुकूल सरल भोजन चुना। गुह ने यह आग्रह नहीं किया कि उनकी आतिथ्य-योजना ही माननी होगी। वे बदल गए। सुनने के कारण उदारता और सटीक हो गई।
लक्ष्मण रात भर सजग रहे। गुह ने साथ और सुरक्षा का प्रस्ताव रखा। उनके बीच उन लोगों का शांत विश्वास बना जो एक ही यात्रियों की देखभाल करते हैं, भले उसका ढंग अलग हो।
पार जाने का समय
सुबह नदी छोटी नहीं हुई थी, पर यात्री विश्राम कर चुके थे और नाव तैयार थी। गुह की मित्रता वनवास मिटा नहीं सकती थी। वह अगला पार सुरक्षित और कम अकेला बना सकती थी।
सबसे अच्छा स्वागत हमेशा भव्य नहीं होता। कभी वह ताजा जल, ध्यान से सुनना, पशु की देखभाल, सोने की जगह और अगले कदम में सहायता होता है।
स्रोत और संपादकीय संदर्भAyodhya Kanda 2.50; Guha’s friendship and hospitality at 2.50.33–47
पुनर्कथन संकेत: मौलिक पुनर्कथन। अध्याय के आतिथ्य-विवरण संक्षिप्त किए गए हैं; अनूदित संवाद की नकल नहीं है।